जला दिया है मुहब्बत के आशियाने को
मिटा दिया है हर इश्क के ठिकाने को
जला के ख़ाक किया शमा ने परवानों को
फिर भी आते हैं शाम ढले मरजाने को
थक गये हैं सितम सहते सहते दुनियाँ के
तरस गये हैं हम मुद्दत से मुस्कराने को
इतना गैरों ने भी ना हमको सताया होगा
जितना वो दर्द दिये सिर्फ आज़माने को
टीस ज़ख्मों की ने डुबो रक्खा है आहों में
गिला करें क्या और क्या कहें ज़माने को
ज़हीन हम न थे इतनें कि उन्हें समझ पाते
सच ही हम मान के बैठे थे हर बहाने को

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